Friday, July 4, 2014

आखिर वह "शहर" बन गया

मेरे शहर का मौसम बदल गया है | पहले जो मेरा मोहल्ला होता था, वह अब 'कालोनी' है | पहले यहाँ के बच्चे अपने मोहल्ले के मिश्रा चाचा,  सरोज चाची, गप्पू भैया और रामेसर काका इत्यादि को हाथ की ऊँगली की तरह पहचानते थे, लेकिन अब बगल वाले घर में कौन-सा परिवार रहने आया है, हम नहीं जानते? महज १०-१२ साल पहले तक, जब इस मोहल्ले के किसी लड़के को गुटखा भी खाना होता था तो वह छिपकर जाता था | अब इसी कालोनी की चौक पर जाम टकराए जाते हैं-खुलेआम | हमारे इस मोहल्ले में एक पुराना मंदिर था | आस्था की छोड़िये, वह सामाजिक गतिविधियों का केंद्र भी था | वहां अब दो-चार जुआ खेलने वालों के अलावा कोई नहीं जाता | मंदिर के ठीक सामने का पोखर आधा भर दिया गया है और सबकी मौन सहमति से बाकी बचे को पूरी कालोनी का कूड़ेदान बना दिया गया है | पोखर की आसपास  की जमीन के टुकड़ों की प्लोटिंग कर उसपर अट्टालिकाएं खड़ी हो गयी हैं | जिस मैदान की छाती को कूटकर ये इमारतें बनायीं गयीं हैं, वही कहीं हमारा बचपन भी दफन है | अब मोहल्ले के लड़कों को खेलने के लिए मैदान नहीं मयस्सर हैं | वैसे अब इसकी जरुरत भी नहीं | ज्यादातर घरों में केवल बूढ़े ही बच गए हैं, जवान अपने बच्चों सहित दिल्ली-मुंबई- निकल गए हैं | हमारा शहर अब सचमुच शहर हो गया है | यहाँ तीन मॉल खुल गए हैं | अपार्टमेंट संस्कृति आ गयी है | जहाँ भूले-भटके अपराध की घटनाएँ होती थीं, अब वे रोजाना की बातें हैं | शहर बड़ा 'हैपनिंग' हो गया है |
~ जनपथ में व्यालोक 

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