हम सब जानते हैं कि गुजरात में क्या हुआ | गोधरा के नृशंस अग्निकांड की सारे हिंदू समाज द्वारा उत्स्फूर्त प्रतिक्रिया, पहली बार लोगों को देखने के लिए मिली | लेकिन गुजरात की सरकार के ऊपर दंगे कराने और सेना न बुलाने का आरोप लगाया गया | यह भी पूरा झूठ है | २७ फरवरी को डिब्बा जलाया गया | २८ को गडबड शुरू होती है और दूसरे ही दिन १ मार्च को निर्धारित स्थानों पर सेना पहुँच जाती है | तीन दिन के अंदर सारा का सारा दंगा काबू में आ जाता है | इसको किसी समाचार पत्र ने नहीं लिखा | फिर ४ मार्च से ३० अप्रैल तक सभी घटनाएँ प्रारंभ करने वाले पाकिस्तान परस्त मुस्लिम थे | हिंदू ने प्रतिक्रिया की | लेकिन अखबारों ने प्रतिक्रिया को छापा, मूलक्रिया को पीछे रख दिया और ऐसा दिखाने का प्रयत्न किया गया , मानो हिंदू राक्षस बनकर अल्पसंख्यकों का निधन यज्ञ कर रहा है |
गुजरात में कुल १८६५२ गांव हैं | अहमदाबाद , वडोदरा ,मेहसाना आदि छोटे-बड़े ७०-८० स्थानों में गडबड हुई | लेकिन दिखाया ऐसा गया कि जैसे पूरा गुजरात जल रहा है |
इस बीच जो सकारात्मक चीज़ें हुईं , उनको किसी ने नहीं छापा |
(१) १२ मार्च से लेकर १७ मार्च तक एक करोड़ बीस लाख विद्यार्थिओं ने सफलतापूर्वक परीक्षाएं दीं |
(२) सात हज़ार हज़ यात्री वापस आये, सुरक्षित अपने-अपने गांव में पहुंचे | वहाँ उनके स्वागत हुए, जुलूस निकले |
(३) मोहर्रम और होली दोनों ही त्यौहार शांतिपूर्वक मनाये गए |
(४) दंगों के कारण विस्थापितों के लिए पहली बार कैंप बनाये गए |
अहमदाबाद में दंगों की परंपरा नयी नहीं है | सन १७१० में पहला दंगा मुगलकाल में हुआ | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी १९६९ में बहुत बड़ा दंगा हुआ| १९७५,१९८५,१९९२,१९९५ में वहाँ दंगे होते रहे | १९८५ के दंगे के समय वहाँ ग्राम पंचायतों, विधानसभा, लोकसभा सब जगह कांग्रेस की सरकार थी | तो भी दंगे को नियंत्रण में लाने के लिए ६ महीने लगे थे |
इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के उपाध्यक्ष ,कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस समय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.एस. तेवतिया के नेतृत्व में गए अध्ययन दल ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से लिखा है कि 'गुजरात के अंदर इस सारे दंगे को भड़काने में दिल्ली के संवाद माध्यम कारणीभूत हैं | समाचार पत्र भी हैं और इलेक्ट्रोनिक माध्यम भी | भावना के वशीभूत होने पर भी गुजरात के समाचार पत्रों ने काफी संतुलित चित्र छापा |
अपने देश में सेकुलरिज्म का मूल आधार है हिंदू विरोध | कोई अपने आप को मुसलमान या ईसाई कहे तो ठीक, लेकिन अपने को हिंदू कहने से बढ़कर और क्या पाप कर्म हो सकता है ?
गुजरात में कुल १८६५२ गांव हैं | अहमदाबाद , वडोदरा ,मेहसाना आदि छोटे-बड़े ७०-८० स्थानों में गडबड हुई | लेकिन दिखाया ऐसा गया कि जैसे पूरा गुजरात जल रहा है |
इस बीच जो सकारात्मक चीज़ें हुईं , उनको किसी ने नहीं छापा |
(१) १२ मार्च से लेकर १७ मार्च तक एक करोड़ बीस लाख विद्यार्थिओं ने सफलतापूर्वक परीक्षाएं दीं |
(२) सात हज़ार हज़ यात्री वापस आये, सुरक्षित अपने-अपने गांव में पहुंचे | वहाँ उनके स्वागत हुए, जुलूस निकले |
(३) मोहर्रम और होली दोनों ही त्यौहार शांतिपूर्वक मनाये गए |
(४) दंगों के कारण विस्थापितों के लिए पहली बार कैंप बनाये गए |
अहमदाबाद में दंगों की परंपरा नयी नहीं है | सन १७१० में पहला दंगा मुगलकाल में हुआ | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी १९६९ में बहुत बड़ा दंगा हुआ| १९७५,१९८५,१९९२,१९९५ में वहाँ दंगे होते रहे | १९८५ के दंगे के समय वहाँ ग्राम पंचायतों, विधानसभा, लोकसभा सब जगह कांग्रेस की सरकार थी | तो भी दंगे को नियंत्रण में लाने के लिए ६ महीने लगे थे |
इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के उपाध्यक्ष ,कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस समय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.एस. तेवतिया के नेतृत्व में गए अध्ययन दल ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से लिखा है कि 'गुजरात के अंदर इस सारे दंगे को भड़काने में दिल्ली के संवाद माध्यम कारणीभूत हैं | समाचार पत्र भी हैं और इलेक्ट्रोनिक माध्यम भी | भावना के वशीभूत होने पर भी गुजरात के समाचार पत्रों ने काफी संतुलित चित्र छापा |
अपने देश में सेकुलरिज्म का मूल आधार है हिंदू विरोध | कोई अपने आप को मुसलमान या ईसाई कहे तो ठीक, लेकिन अपने को हिंदू कहने से बढ़कर और क्या पाप कर्म हो सकता है ?
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