Monday, March 28, 2011

हम गण के तंत्र बन सकें

" हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडतासुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। "

अब सवाल यह उठता कि इस शपथ के निर्वाह में हम कितने सफल रहे हैं?

पहले कुछ उत्साह जगाने वाली बातें - 1950 में हमारी आर्थिक विकास दर 1.9 प्रतिशत थी। अब 8.5 से 9 प्रतिशत के बीच में है। उस समय साक्षरता की दर 18 प्रतिशत थी। अब देश में 68 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। तब 48 प्रतिशत लोग गरीब माने जाते थे। अब इनकी संख्या 37.2 प्रतिशत है।

अब निराशाजनक बातें - किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्हें फसल की उचित कीमत नहीं मिल रही है। उपभोक्ता को सही दाम पर कृषि उत्पाद नहीं मिल रहे। 203 खरब से ज्यादा रुपया परदेसी बैंकों में पड़ा हुआ है। यह वह काला धन है जिसे देश के जरूरतमंद लोगों से छीनकर चोरी-छिपे यहां जमा किया गया है। सच है कि किसी भी सरकार ने इस धन की वापसी पर ईमानदारी से काम नहीं किया है। वजह साफ है। भ्रष्टाचार की गंगा को सबने मैला किया है और कोई भी इस काजल की कोठरी का ताला खोलने का साहस नहीं रखता।छह दशकों में हमारी सत्ता और समाज में भ्रष्टाचार का दखल बेहद बढ़ा है।

हमें इस देश में ऐसा तंत्र चाहिए जो गण के लिए, गण के जरिए, गण के द्वारा बनाया गया हो, ताकि हम गण के तंत्र बन सकें, न कि तंत्र के गण जैसे कि आज हैं।

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